कभी कभी मैं सोचता हूँ कि ज़िन्दगी क्या है
दिन आते हैं दिन जाते हैं, ये बस चल रही है
रेलगाड़ी की तरह एक दिशा में बढ़ रहा है सब
जैसे मानो थमने का कोई इरादा ही न हो |
सभी तरह के जीव-जंतू पशु-पक्षी इसमें समाए हैं
और हम मानव भी इससे बच नहीं पाए हैं
रोज़ सुबह निकलते हैं सब एक ही दौड़ में
दिन का जल और भोजन किसी तरह से नसीब हो जाए |
जंगलों में जो रहते हैं सुबह उठते तो हैं लेकिन
शाम के भोजन का कुछ पता नहीं होता
ज़िन्दगी लगी होती है दाव पर क्योंकि
खुद कि कोई बात नहीं पर बच्चों को कोई कैसे भूखा छोड़े भला |
और शहरों में रहने वालों नें इजाद किये हैं तरीके नए-नए
प्रौद्योगिकी और प्रबंधन, अर्थ और विज्ञान
वाही शाम का भोजन और जल निश्चित करने के लिए
पर क्या ज़िन्दगी अब भी दाव पर नहीं है?
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